अंतरराष्ट्रीय नाट्य महोत्सव भारंगम 2024 में इन्द्रवती नाट्य समिति के कलाकार करेंगे बसामन मामा नाटक की प्रस्तुति
Newspost, Regional Desk, RB Singh ‘Raaz’, सीधी.
मध्य प्रदेश का सीधी जिला साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के लिये अपनी अपनी अलग पहचान रखता है। यहाँ की अग्रणी नाट्य संस्था इन्द्रवती नाट्य समिति को रंगमंच की दुनिया में एक और उपलब्धि मिली है।
इस संस्था को पहले 2015 में भी भारत रंग महोत्सव में नीरज कुंदेर व रोशनी प्रसाद मिश्र द्वारा निर्देशित नाटक “कर्णभारम” का मंचन दिल्ली में किया था जिसकी खूब तारीफ़ की गई थी। इसके बाद 2017 में थिएटर ओलम्पिक जो भारत में पहली बार आयोजित हुआ था उसमें भी नीरज कुंदेर द्वारा निर्देशित एकलव्य नाटक का शानदार मंचन किया गया था जिसकी अभी भी चर्चा होती है।
इसी कड़ी में अब रोशनी प्रसाद मिश्र द्वारा लिखित एवं रजनीश जायसवाल द्वारा निर्देशित नाटक “बसामन मामा” का 23 वें भारत रंग महोत्सव 2024 के लिए चयन किया गया है। नाटक का संगीत निर्देशन रोशनी प्रसाद मिश्र, वस्त्र विन्यास प्रजीत साकेत, नृत्य परिकल्पना शिव नारायण कुंदेर ने किया है और मार्गदर्शन नीरज कुंदेर का है।

नाटक बसामन मामा के भारंगम 2024 में मंचन के लिए चयन होने पर देश भर के रंगकर्मियों द्वारा बधाई दी जा रही है जो सीधी के लिए गौरव का विषय है। “भारत रंग महोत्सव” का आयोजन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली द्वारा किया जाता है जो न सिर्फ भारत का बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा नाट्य महोत्सव है जिसमें दुनिया भर के नाटकों को मंचन के लिए आमंत्रित किया जाता है।
इस नाटक में बघेलखंड की लोक कलाओं का अद्भुत प्रयोग किया गया है या कहें कि बघेलखंड की संपूर्ण लोक ही समाया हुआ है। गुदुम बाजा नृत्य नाटक को सौंदर्य प्रदान करता है जो दर्शकों के मन को मोह लेता है।
नाटक में अभिनेताओं का शानदार अभिनय दर्शकों को गुदगुदाता भी है और रुलाता भी है। यह नाटक पूर्णतः सम सामयिक है जो सत्य घटना पर आधारित है, बसामन मामा रीवा जिले के वीणा सेमरिया के पास स्थित एक गांव कुम्हरा है जहां बसामन शुक्ला नाम के एक व्यक्ति थे। वे राजा के द्वारा पीपल का पेड़ कटवाने से दुखी होकर अपने ही कलेजे में कटार मारकर मर जाते हैं। तब उनकी आत्मा पूरे राज्य को नष्ट कर देती है सिर्फ रानी और उसका एक पुत्र बच जाते हैं। आत्मा पुत्र को मारने ही वाली थी तभी रानी उन्हें बसामन मामा का संबोधन करवाती हैं और वह उसे क्षमा कर देते हैं और मैहर में मां शारदा की शरण में चले जाते हैं।
बारह वर्ष की तपस्या के उपरांत मां शारदा उस आत्मा को अपने जन्म स्थान पर जाने को कहती हैं और वो जाकर अपने पिता को स्वप्न में एक चबूतरा बनाने को कहते हैं। पिता पीपल के पेड़ के पास (जो बसामन के द्वारा पीपल की डाली तोड़कर लगाई गई थी) उसी के पास चबूतरा बना देते हैं। तब से वह बसामन मामा के रूप में पूजे जाने लगते हैं। यह एक अच्छे प्रकृति प्रेमी का उदाहरण है।
