🪷 आगामी सप्ताह आपके लिए मंगलमय हो 🪷

Newspost, Motivational/Spiritual Desk. Swami Dayanand Sharma.

     भगवान श्रीगणेश ने माना और सिद्ध किया कि माता-पिता का स्थान सर्वथा सर्वोपरि है। क्योंकि वे ही हमारी उत्पत्ति और अस्तित्व के आधार हैं। यदि संतान अपने माता-पिता का सम्मान करना भूल जाए और उन्हें कटु वचन कहने लगे, तो यह समझना चाहिए कि कहीं न कहीं संस्कारों की नींव कमजोर रह गई है। प्रेम और लाड़-दुलार देना तो माता-पिता का सहज स्वभाव है, किंतु दुलार के अतिरेक में यदि नैतिक मूल्यों और संस्कारों की अनदेखी कर दी जाए, तो भविष्य में संतान का आचरण कष्टकारी हो सकता है।

             संस्कारों के बिना एक परिवार मात्र 'मुसाफिरखाना' बनकर रह जाता है, जहाँ लोग साथ तो रहते हैं, पर उनके दिलों में जुड़ाव नहीं होता। ऐसे वातावरण में संबंधों का स्थान कुसंग और अहंकार ले लेते हैं, जिससे घर की सुख-शांति भंग हो जाती है। सच्चा परिवार वही है जहाँ प्रेम के साथ-साथ बड़ों के प्रति आदर और मर्यादित व्यवहार की गरिमा बनी रहे।

       हमारी संगति चित्त पर गहरे प्रभाव छोड़ती है, ऊँचा उठा भी सकती है तो कभी रास्ते से भटका भी सकती है। इसलिए जीवन में होने वाले हर बदलाव का कारण केवल माता-पिता के संस्कारों को मान लेना, अपनी जिम्मेदारी से बचना है। वास्तव में संस्कार बीज हैं, पर उसके वृक्ष बनने की प्रक्रिया में भूमि, जल और वातावरण का भी उतना ही योगदान होता है। स्मरण रहे—जहाँ संस्कारों की कमी होती है, वहाँ सुख और शांति टिक नहीं पाते।

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