Newspost, Editorial Desk. Shared by- Dayanand Sharma, Editing-Rohit Gupta
यह बात उस दिनों की है जब स्व. श्री टी.एन. शेषन भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त थे। वे अपनी धर्मपत्नी के साथ उत्तर प्रदेश की यात्रा पर थे। चलती कार से उनकी श्रीमती जी ने सड़क के किनारे एक पेड़ पर ‘बया चिड़िया’ (एक प्रकार की चिड़िया जो लटकता हुआ कलात्मक घोसला बनाती है) का घोंसला देखा और लालायित होकर कहा कि, ”वह घोंसला मुझे चाहिए; मैं उसे अपने घर पर सजाकर रखना चाहतीं हूँ।” पत्नी के आग्रह को श्री टीएन शेषन ठुकरा न सके और साथ चल रहे सुरक्षा गार्ड से उस घोंसले को नीचे उतारने को कहा।
अनपढ़ चरवाहा लड़के ने फिर क्या कहा...
सुरक्षा गार्ड कार से उतरा और पास ही भेड़-बकरियां चरा रहे एक अनपढ़ लड़के से कहा कि “अगर तुम यह घोंसला निकाल कर हमें दे दोगे तो मैं तुम्हें बदले में दस रुपये दूंगा।” लेकिन लड़के ने मना कर दिया। तब श्री शेषन स्वयं वहाँ गये और चरवाहा लड़के को पचास रुपये देने की पहल की। लेकिन, उस लड़के ने घोंसला उतारने से साफ मना कर दिया। श्री शेषन से उस चरवाहा अनपढ़ लड़के ने कहा कि, “सर, इस घोंसले में चिडिया के बच्चे हैं।” “शाम को जब उन बच्चों की माँ खाना लेकर आएगी तो वह बहुत उदास होगी।” “इसलिए तुम कितना भी पैसा दे दो, मैं घोंसला नहीं उतारूंगा।”
श्री शेषन ने फिर वह लिखा... जो....
इस घटना के बारे में श्री शेषन लिखते हैं कि… “मुझे जीवन भर इस बात का अफ़सोस रहा कि एक पढ़े-लिखे आईएएस में वो विचार और भावनाएँ क्यों नहीं आईं जो एक अनपढ़ लड़का सोचता था?” उन्होंने आगे लिखा कि- “मेरी तमाम डिग्री, आईएएस का पद, प्रतिष्ठा, पैसा सब कुछ उस अनपढ़ बच्चे के सामने मिट्टी में मिल गया।” जीवन तभी आनंददायक बनता है जब बुद्धि और धन के साथ संवेदनशीलता भी हो।
