Newspost, Editorial Desk. @rohitgupta

धार्मिक अनुष्ठान व सांस्कृतिक, सामाजिक अवसरों पर पान के उपयोग को सामान्य शिष्टाचार से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह पान अत्यंत महत्वपूर्ण है। आप यह जानकर अचंभित हो जाएंगे कि पान के पत्ते ने अब अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए नई उम्मीद जगा दी है। हाल ही लखनऊ विश्वविद्यालय की बायो जेरोन्टोलॉजी और न्यूरो बायोलॉजी प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों की एक टीम ने पान के पत्ते में पाए जाने वाले एक विशेष प्राकृतिक तत्व 'हाइड्रॉक्सी चाविकोल' को दवा के रूप में इस्तेमाल किए जाने की संभावनाओं का पता लगाया है।

क्या है अल्जाइमर या डिमेंशिया रोग-

अल्जाइमर रोग को दुनियाभर में डिमेंशिया का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। इस बीमारी में धीरे-धीरे याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता कम होती जाती है। अभी तक इस रोग का पूरा इलाज मौजूद नहीं है, और जो दवाएँ मिलती हैं वे सीमित राहत ही दे पाती हैं। इसी कारण वैज्ञानिक लगातार नई दवाओं की तलाश में जुटे हैं। 

शोध के नेतृत्वकर्ता का कहना -

शोध का नेतृत्व कर रहे डॉ. नितीश राय ने बताया कि ‘शोध के दौरान कम्प्यूटर आधारित तकनीकों से यह देखा गया कि हाइड्रॉक्सी चाविकोल शरीर के उन प्रोटीनों पर कैसे असर डालता है जो अल्जाइमर से जुड़े होते हैं। उन्होंने बताया कि शोध के दौरान ऐसे 88 जीनों की पहचान की गई, जो इस तत्व और बीमारी दोनों से जुड़े पाए गए। इनमें से सीओएमटी, एचएसपी -1 और जीएपीडीएच नाम के तीन प्रोटीन सबसे अहम साबित हुए। ये प्रोटीन दिमाग में संदेश पहुंचाने और मस्तिष्क कोशिकाओं की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।’

पान से दवा बनाने की तैयारी 

शोध से यह भी पता चला कि यह तत्व इन प्रोटीनों से अच्छी तरह जुड़ता है और बीमारी से जुड़े कई कारणों पर एक साथ असर डाल सकता है। इसमें दवा जैसे गुण पाए गए हैं और यह शरीर में आसानी से अवशोषित हो सकता है। इसलिए भविष्य में इसे मौखिक दवा यानी गोली के रूप में विकसित किया जा सकता है। 

पान के पत्ते में पाया जाने वाला तत्व आसानी से उपलब्ध

डॉ. नितीश राय ने बताया कि “यह खोज अभी शुरुआती चरण में है और इसे आगे प्रयोगशाला व मरीजों पर परीक्षणों के बाद ही उपयोग में लाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि पान के पत्ते में पाया जाने वाला यह तत्व सस्ता, सुरक्षित और आसानी से उपलब्ध हो सकता है, इसलिए इसे एक बेहतर विकल्प के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।”

Dr. Nitish rai, faculty, Lucknow University.

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