Newspost, Editorial Desk. ✒️ Swami Dayanand Sharma
दिन भर की भाग दौड़, विचारों के शोर और मन के बोझ के बीच रात हमें ठहरने और विश्राम करने का निमंत्रण देती है। रात्रि का यह समय प्रश्नों में उलझने का नहीं, बल्कि भीतर झाँकने का होता है। यह सोचने का समय होता है कि वास्तव में हमें थकाता क्या है? क्या जीवन स्वयं भारी है, या हमने उसे अपनी इच्छाओं और विचारों से बोझिल बना लिया है? इस शांत क्षण में यह संदेश हमें स्मरण कराता है कि शांति कोई दूर की उपलब्धि नहीं, बल्कि हमारे भीतर सदा उपस्थित एक सहज अवस्था है, जिसे केवल पहचानने की आवश्यकता है।
इस संदेश में दिए गए चित्र पर भी ध्यान दें। चित्र में बहती नदी के किनारे बैठी स्त्री और उसके पास रखा भरा हुआ संदूक हमारे ही मन का प्रतीक है। स्मृतियाँ, ज्ञान, मान, पुरस्कार, रिश्ते, धन, भय और तुलना—सब कुछ हमने सहेज कर रखा है, मानो इन्हीं से हमारा अस्तित्व निर्धारित होता हो। जीवन अपनी धारा में निरंतर आगे बढ़ रहा है, पर हम अतीत और अपेक्षाओं को थामे बैठे हैं। यही पकड़ हमें थकाती है, यही पकड़ मन को भारी बना देती है।
फिर हम पूछते हैं—“शांति क्यों नहीं है?” जबकि शांति कहीं गई ही नहीं। वह सदा हमारे भीतर उपस्थित रही है। बस हमारे हाथ इतने भरे हुए हैं कि उसे महसूस करने की जगह नहीं बची। जब हम थोड़ा छोड़ना सीखते हैं, जब अनावश्यक बोझ से मुक्त होते हैं, तब जीवन वही का वही रहता है—पर भीतर शांति स्वतः उतर आती है। भरे पात्र में कुछ भी नहीं भरा जा सकता, अमृत भी नहीं। इसलिए पात्र को खाली करने का प्रयास करें, तभी सुख शांति और संतुष्टि उसमें स्थान पा सकते हैं। शुभ रात्रि 🌹🙏🏻
