Newspost, Spiritual Desk. Shared by- Swami Dayanand Sharma
बिना प्रेरणा लिए हमारा जीवन प्रेरणादायक नहीं बन सकता है। जिसमें कुछ सीखने की ललक होती है, वही कुछ सिखाने की पात्रता भी रखता है। यदि हम लेना चाहें तो संपूर्ण प्रकृति प्रेरणा से भरी हुई है। प्रेरणा पर्वत से लेनी चाहिए जिसके मार्ग में अनेक आंधी और तूफान आते हैं पर उसके स्वाभिमान एवं मस्तक को नहीं झुका पाते।
प्रेरणा लहरों से लेनी चाहिए जो गिरकर फिर उठ जाती हैं और अपने लक्ष्य तक पहुँचे बगैर रुकती नहीं। प्रेरणा बादलों से लेनी चाहिये जो समुद्र से जल लेते हैं और रेगिस्तान में बरसा देते हैं। प्रेरणा हमें वृक्षों से लेना है, फल लग जाने के बाद जिनकी डालियाँ स्वतः झुक जाया करती हैं।
प्रेरणा उन फूलों से लेनी चाहिए जो खिलते भी दूसरों के लिए और टूटते भी दूसरों के लिए हैं। जो व्यक्ति प्रेरणा लेना जानता है उसका जीवन एक दिन स्वतः प्रेरणा दायक भी बन जाता है।
एक और सन्देश…
ज्ञान का आचरण में उतरना भी आवश्यक है। जब हम ज्ञान को व्यवहार में लाते हैं, तो हम दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन सकते हैं और उन्हें भी ज्ञान को व्यवहार में लाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। जो ज्ञान आचरण में नहीं उतर पाता वह कंजूस के उस धन के समान ही है, जो तिजोरी में तो पड़ा है पर आवश्यकताओं की पूर्ति में कभी भी सहायक नहीं हो पाता है।
एक ज्ञानी और संसारी में यही फर्क है कि ज्ञानी मरते हुए भी हँसता है और संसारी जीते हुए भी रोता है। ज्ञान हँसना नहीं सिखाता, बस रोने के कारणों को मिटा देता है। ज्ञानी इसलिए हर स्थिति में प्रसन्न रहता है क्योंकि वह जानता है कि जो मुझे मिला, वो कभी मेरा था ही नहीं और जो कुछ मुझसे छूट रहा है, वह भी मेरा नहीं है।
संसारी इसलिए रोता है क्योंकि उसकी मान्यताओं में जो कुछ उसे मिला है उसी का था और उसी के बल पर मिला है। जो कुछ छूट रहा है, वह सदा सर्वदा उस पर अपना अधिकार मान कर बैठा है। जीवन में अज्ञान से आसक्ति एवं आसक्ति से दुःखों का जन्म होता है। ज्ञान की क्रियात्मक पहल है आचरण।
सुरपति दास
इस्कॉन/भक्तिवेदांत हॉस्पिटल
