🪷महाशिवरात्रि की मंगलमय शुभकामनायें 🪷

Newspost, Spiritual Desk. 🎙️Swami Dayanand Sharma

    
महाशिवरात्रि- यह भगवान शिव एवं शक्ति स्वरूपा मां भगवती के पवित्र प्रेम की सिद्धि, अहंकार रूपी हिमालय पर विजय को अनुभव करने का अवसर तो है ही, यह वह रात्रि है जब मनुष्य बाह्य जगत से हटकर अपने भीतर की ओर लौटता है। यह पर्व पूजा-विधि से अधिक आत्म-बोध का अवसर है। जहाँ अहं का शोर शांत होता है, वहीं चेतना का दीप स्वयं प्रज्वलित होता है। “शिव को पाना नहीं - स्वयं को खोकर शिव में स्थित होना है”। तपस्या से शिव नहीं मिलते अपितु तपस्या से वह मिटता है जो शिव से भिन्न है। ध्यान दें -जब भेद शेष न रहा, तभी शिव-पार्वती का मिलन घटित हुआ।

      संतुलन ही जीवन का आधार है। शक्ति यदि समझ से रहित हो तो बंधन बन जाती है, और समझ यदि कर्म से रहित हो तो निष्क्रिय हो जाती है। शिव-पार्वती का दिव्य मिलन इसी संतुलन का प्रतीक है जहाँ जीव की चंचल शक्ति, शिव की शुद्ध चेतना में विश्राम पाती है। न पाने की लालसा रहे, न खोने का भय; न सिद्ध होने की हड़बड़ी, न असिद्धि का विषाद। जहाँ ऐसा ठहराव हो, वहीं शिव-भाव प्रकट होता है। "शिव-भाव में स्थित होने पर ही शिव-तत्त्व की अनुभूति होती है।”

'स्व' को त्यागना ही 'शिव' को पाना है 
     
जब भीतर की धुंध छँटने लगती है, तब साधक जान लेता है कि सत्य बाहर नहीं, भीतर है। मन शांत और जीवन सरल हो जाता है। महाशिवरात्रि यही स्मरण कराती है कि शिव को पाना नहीं है, बल्कि स्वयं को खोकर शिव में स्थित होना है—क्योंकि जो भीतर से अचल हो गया, जो सब देखता है पर किसी से बँधता नहीं, वहीं जीव शिव में विलीन हो जाता है। जहाँ न पाने की लालसा है, न खोने का भय, न सिद्ध होने की हड़बड़ी—वही शिव की स्थिति है। जीवोत्पत्ति के साथ ही जीव के शिव में विलीन होने का महापर्व है- महाशिवरात्रि!

🪷🙏 हर हर महादेव 🙏🪷

✍🏻दयानन्द शर्मा

संपादन – रोहित गुप्त

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *