🔸जी हाँ! एमपी के सिंगरौली जिले में दहजुड़ में रक्षाबंधन के दिन पहाड़ के किनारे भव्य मेला लगता है, मनाया जाता है कजलियां का त्यौहार, पहाड़ के ऊपर शंकर जी व देवी माँ के दर्शन करने पंहुचते हैं हजारों लोग

Newspost, Regional Desk. Rep. Bihari Lal Gupta

मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में सर‌ई नगर परिषद के वार्ड नं. 15  दहजुड़ में श्रावण पूर्णिमा, रक्षाबंधन के दिन विशेष पर्व ‘कजलियां’ के अवसर पर, पहाड़ के किनारे विशाल मेला लगता है जो इस वर्ष भी लगा। यह पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर और धार्मिक मान्यताओं का प्रतीक है। इस मेले में आसपास और दूर दराज के लोग सम्मिलित होते हैं। यहाँ आने वाले सभी लोग दहजुड़ पर्वत पर मंदिर में विराजमान भगवान शिव एवं देवी माँ का दर्शन पूजन भी करते हैं। 

स्थानीय पार्षद ने बताया कि यह मेला कई दशकों से लग रहा है। यह परंपरा वर्षों पुरानी है। इस वर्ष भी रक्षाबंधन के दिन जब आसमान पर रेशमी बादल और सूरज की किरणें नृत्य कर रही थीं, दहजुड़ के पहाड़ों पर हर्षोल्लास का माहौल छा गया। मेले के देशी अंदाज में चारों ओर सजावट दिखाई दे रही थी। स्थानीय लोगों ने पारंपरिक वस्त्र पहनकर, हाथ में पूजा सामग्री लिए हुए, उत्सव की शोभा को और बढ़ा रहे थे। कजलियां के पर्व पर भक्तों की भीड़ ने पहाड़ की पगडंडियों पर चलते हुए उसकी चोटी पर स्थित शंकर जी और देवी माँ के मंदिर की ओर रुख किया। यहाँ पहुंचकर लोग आस्था और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना में लीन हो गए। शंकर जी और देवी जी के दर्शन कर भक्तों ने अपनी मनोकामनाएँ प्रस्तुत की और मंदिर परिसर में उमड़ा जन सैलाब इस धार्मिक महापर्व की गरिमा को बढ़ा रहा था। मेला क्षेत्र में लोक कला, सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक खेलों का आयोजन किया गया।

A local Councillor said…

यह मेला धार्मिक- सांस्कृतिक मान्यताओं को देता है आयाम

यहाँ विभिन्न प्रकार की स्टॉल्स और खाद्य पदार्थ भी प्रदर्शित किए गए थे, जिनमें स्थानीय पकवान और मिठाइयाँ प्रमुख थीं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने इस मेले का आनंद लिया और पर्व की खुशी में शामिल हुए। इस भव्य मेले और पर्व की समृद्धि ने दहजुड़ के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। पर्व ने न केवल आस्था और विश्वास को मजबूती दी, बल्कि समुदाय के बीच एकता और मिलनसारिता को भी प्रकट किया। कजलियां का त्यौहार दहजुड़ के निवासियों के लिए एक यादगार अनुभव रहता है। यह इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को जीवित रखने में सहायक रहा। इस दौरान हजारों की संख्या लोग पंहुचे हुए थे। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस की उपस्थिति भी दिखी।

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