Newspost, Spiritual Desk. Swami Dayanand Sharma.

भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ॥
याभ्यां विना न पश्यन्ति, सिद्धाःश्वान्तः स्थमीश्वरम्॥

   भावार्थ:-श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वतीजी और श्री शंकरजी की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते॥
शंकर विश्वास हैं तो भवानी श्रद्धा। दोनों की उपासना से ही सिद्धि या अंतःकरण में स्थित परमात्म देव के दर्शन सम्भव होते हैं।
     शिवत्व अर्थात् जीवन के बुरे तत्वों का संहार-ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख कारण है किन्तु शिव अकेला अपूर्ण है उसे उमा भी चाहिए। उमा अर्थात् गुणों का अभिवर्द्धन। शिव का अर्थ है असुरता का संहार और भवानी का अर्थ है भावनाओं का परिष्कार। शिव के रूप में विश्वास दृढ़ होता है, कठिन होता है पर भवानी के रूप में श्रद्धा सरल और सुखदायक होती है। अतः विश्वास जगाना हो तो श्रद्धा की शरण लेनी चाहिए। श्रद्धा साधना को सरल बना देती है, सुख रूप कर देती है।
जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ। तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥

🪷 हर हर महादेव, मगलम् भवतु!!!🪷

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