Newspost, Global Desk.
आज हम एक ऐसा सच्चा प्रसंग आपके लिए लेकर आए हैं जो वास्तव में दिल को छूने वाला है। यह निराशा और हताशा के अंधेरों से घिरे लोगों विशेषकर युवाओं के लिए अत्यंत प्रेरणाप्रद भी है। प्रसंग महाराष्ट्र का है। यहाँ पुणे के येरवडा बस्ती की झुग्गी-झोपड़ी से निकली एक लड़की ने सम्पूर्ण भारत को गर्व से भर दिया है। जिसका जीवन संघर्षों से भरा था, उसने राह के रोड़ों से सीढ़ी बनाई। इस सीढ़ी पर वह चढ़ती गई और अमेरिकी संस्थान में प्रोफ़ेसर बन गई। राह के रोड़ों पर चलकर अमेरिका में प्रोफेसर तक का सफ़र तय करने वाली दलित कन्या शैलजा पाइक हैं। अब इन्हें प्रतिष्ठित ‘मैकआर्थर’ फैलोशिप सम्मान से अलंकृत किया गया है।
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प्रतिष्ठित ‘मैकआर्थर’ फैलोशिप के लिए चयनित अभ्यर्थियों को पांच साल के लिए विभिन्न चरणों में 8 लाख डॉलर की राशि अर्थात ₹ 6 करोड़ 71 लाख रुपये प्रदान की जाती है। जॉन डी. और कैथरीन टी. मैकआर्थर फाउंडेशन द्वारा ‘मैकआर्थर फ़ैलो प्रोग्राम’ की ‘जीनियस ग्रांट’ फैलोशिप अमेरिका में अलग-अलग क्षेत्र के 20 से 30 शोधकर्ताओं और विद्वानों को हर वर्ष दी जाती है।
शैलजा पाइक एक शोधार्थी हैं। उन्होंने अपने शोध पत्र के माध्यम से दलित महिलाओं के जीवन को गहराई से प्रस्तुत किया है। एक इतिहासकार के रूप में उन्होंने दलित महिलाओं के योगदान और उनकी आत्मचेतना की जागृति का इतिहास लिखा है।
Courtesy: BBC
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