श्रीमद्भागवत गीता का सन्देश !
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जीवन जीने की दिव्यतम-भव्यतम कल्पना का साकार रूप ही श्रीमद्भगवद्गीता है। जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसे गीता ने स्पर्श ना किया हो। जीवन की ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान गीता से ना प्राप्त किया जा सके। गीता अर्जुन के समक्ष अवश्य गाई गई लेकिन केवल अर्जुन के लिए नहीं गाई गई।
गीता गाई गई ताकि हम जीवन में समत्व को धारण करते हुए आनंद पूर्वक जी सकें लाभ-हानि में, सुख-दुःख में और सम-विषम परिस्थितियों में। गीता ने कर्म के अति रहस्यमय सिद्धान्त को स्पष्ट करते हुये कहा कि भावना की शुद्धि ही कर्म की शुद्धि है। महत्वपूर्ण ये नहीं कि आप क्या करते हैं? अपितु ये है कि किस भाव से करते हैं।
वर्तमान समय में मनुष्य जीवन की बहुत सारी समस्याओं से पीड़ित है। जिनके पास सुख साधन हैं वो दुखी और जिनके पास नहीं हैं वो भी दुखी। कभी कभी हमें ये पता तो चल जाता है कि हम रोगी हैं पर ये पता नहीं चल पाता कि रोग क्या है? गीता रोग भी बताती है और औषधि भी बताती है। हमारे जीवन का विषाद, प्रसाद बन जाये यही तो गीता जी की अनमोल सीख है।
