‘विधर्म नहीं स्वीकार..’
Newspost, Literary Desk. @RohitGupta
बाबा जोरावर, फतेह ने जब भरी हुंकार ।
भले शीश कट जाए विधर्म नहीं स्वीकार ।।
तब विधर्मी मुगलों ने जारी की फरमान ।
जिंदा इनको चिनवा दो खड़ी करो दीवार ।।
अदम्य साहस देखकर इनका दुश्मन हुआ निराश ।
प्राणों के उत्सर्ग का इनको किंचित न था संत्रास ।।
देश धर्म के खातिर जिसने किया हवन ।
ऐसे वीर साहबजादों को है शत बार नमन ।।
कवि : महेश चन्द्र गुप्त ‘महेश’, लखनऊ

