कथित टिप्पणी वापस लेने की मांग की
Newspost, National Desk.
'ट्रेड यूनियनों और घरेलू कामगारों की मजदूरी पर न्यायिक टिप्पणियाँ संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करती हैं। यह कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से विचलन के समान है।' यह कहना है ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) का। AITUC की महासचिव अमरजीत कौर द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि, 'सुप्रीम कोर्ट द्वारा औद्योगिक ठहराव के लिए "आक्रामक ट्रेड यूनियनवाद" को जिम्मेदार ठहराने वाली आलोचना को सख्ती से खारिज करती है और इस पर कड़ा एतराज़ दर्ज करती है। यह टिप्पणी न्यायिक सोच के वर्गीय चरित्र को उजागर करती है, जो संविधान में निहित समाजवादी लोकतंत्र के आदर्शों के प्रतिकूल है। AITUC माननीय सुप्रीम कोर्ट से इन टिप्पणियों को वापस लेने की मांग करती है।'
इस मामले में एपेक्स कोर्ट ने दी टिप्पणी
बीते 29 जनवरी 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने पेन थोझिलर्गल संगम एवं अन्य ट्रेड यूनियनों द्वारा दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि 'झंडा उठाए ट्रेड यूनियनों की जबरन नेतृत्व शैली और काम से प्रतिरोध की संस्कृति के कारण देश में कई औद्योगिक प्रतिष्ठान बंद हुए हैं।'
AITUC की प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को उद्धृत करते हुए AITUC का कहना है कि 'ऐसी टिप्पणियाँ और साथ ही घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार करना, अत्यंत चिंताजनक, गहराई से परेशान करने वाला और सामाजिक न्याय, समानता तथा श्रम की गरिमा के संवैधानिक दायित्व के विपरीत है।' AITUC का मानना है कि 'ऐसी असावधान टिप्पणियाँ मजदूरों के संघर्षों को अवैध ठहराने और श्रम अधिकारों की रक्षा में ट्रेड यूनियनों की लोकतांत्रिक भूमिका को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती हैं। ये बयान अनजाने में उन ऐतिहासिक कथाओं की पुनरावृत्ति करते हैं जिनका इस्तेमाल श्रम अधिकारों को कमजोर करने और सामूहिक संघर्ष को दबाने के लिए किया गया है।'
जारी विज्ञप्ति में जिक्र किया गया है कि, 'AITUC दृढ़ता से कहती है कि ट्रेड यूनियन आर्थिक विकास में बाधा नहीं हैं। बल्कि संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त लोकतांत्रिक संस्थाएँ हैं, जो मजदूरों की गरिमा, आजीविका और अधिकारों की रक्षा करती हैं। संघ और संगठन बनाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (c) के अंतर्गत मौलिक अधिकार है और सामूहिक सौदेबाजी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त श्रम अधिकार है। ट्रेड यूनियन गतिविधियों को औद्योगिक ठहराव का कारण बताना आर्थिक वास्तविकताओं की गलत व्याख्या है और कॉरपोरेट समर्थक नीतियों के विनाशकारी प्रभावों की अनदेखी करता है, जिनसे बेलगाम कॉरपोरेट एकाधिकार बढ़ा है।
टिप्पणी पर जताई चिंता
AITUC घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी को मान्यता देने से इनकार किए जाने से विशेष रूप से व्यथित है। घरेलू कामगारों का यह वर्ग अत्यधिक असंगठित, सामाजिक रूप से हाशिए पर पड़ा हुआ और मुख्यतः महिलाओं से बना है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 21 की भावना की अनदेखी कर सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से निपटने के संवैधानिक उपायों को नकारना गंभीर चिंता का विषय है।
मनरेगा सहित अन्य मुद्दों के साथ 12 को प्रस्तावित है देशव्यापी हड़ताल
AITUC के जारी बयान में कहा गया है कि, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब सरकार कामकाजी लोगों और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले तेज कर चुकी है। यह 12 फरवरी को प्रस्तावित देशव्यापी आम हड़ताल की पृष्ठभूमि में आई है, जब मजदूर और किसान मिलकर श्रम संहिताओं, मनरेगा के स्थान पर वी.बी. ग्राम योजना (विकसित भारत जी रामजी योजना), बीमा क्षेत्र में 100 फीसदी एफडीआई, निजीकरण नीतियों, विद्युत संशोधन विधेयक 2025, बीज विधेयक और शांति विधेयक जैसे मजदूर विरोधी कानूनों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध दर्ज करेंगे। ये नीतियाँ श्रम सुरक्षा को खत्म करती हैं। सामूहिक सौदेबाजी को कमजोर करती हैं। लोकतांत्रिक अधिकारों का क्षरण करती हैं और राष्ट्रीय संपदा को कॉरपोरेट लूट के हवाले करती हैं।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट इन नीतिगत हमलों पर मौन रहते हुए, उन्हीं ट्रेड यूनियनों को निशाना बना रहा है जो इस हमले का प्रतिरोध कर रही हैं। मजदूरों के वैध संघर्षों को दोषी ठहराने वाली ऐसी टिप्पणियाँ वस्तुगत रूप से मजदूर-विरोधी, किसान विरोधी शक्तियों के साथ खड़ी दिखाई देती हैं और श्रम व जनता के खिलाफ जारी वर्गीय हमले को न्यायिक वैधता प्रदान करने का खतरा पैदा करती हैं।
ट्रेड यूनियन का कहना है कि यह अत्यंत चिंता का विषय है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ ट्रेड यूनियनों के ऐतिहासिक योगदान और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करती हैं। ट्रेड यूनियनों ने श्रमिक अधिकारों की स्थापना, सार्वजनिक क्षेत्र के निर्माण, औद्योगिक विस्तार और लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद (federalism) व नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा में केंद्रीय भूमिका निभाई है। ट्रेड यूनियनवाद को प्रगति में बाधा बताना इस विरासत को मिटाने जैसा है। न्यायपालिका जैसे उच्च संवैधानिक पद से ऐसी संकीर्ण और इतिहासविहीन दृष्टि अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
श्रम संहिताओं पर करनी चाहिए थी टिप्पणी!
ट्रेड यूनियनों को निशाना बनाने के बजाय सुप्रीम कोर्ट को उन श्रम संहिताओं और नीतियों पर टिप्पणी करनी चाहिए थी जो सुनियोजित ढंग से मजदूरों के अधिकारों को कमजोर कर रही हैं और संपत्ति को कुछ गिने-चुने हाथों में केंद्रित कर रही हैं।
भारतीय संविधान न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक मानता है, जिस पर समाज के सबसे कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा की विशेष जिम्मेदारी है। ट्रेड यूनियन अधिकारों की अनुचित आलोचना या असंगठित मजदूरों के बहिष्कार को सामान्य ठहराने वाली टिप्पणियाँ संवैधानिक लोकतंत्र को कमजोर करती हैं।
संगठन की मांग
AITUC मांग करती है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट औद्योगिक ठहराव के लिए ट्रेड यूनियनवाद को जिम्मेदार ठहराने वाली टिप्पणियाँ वापस ले और घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी की वैध मांग पर अपने रुख पर पुनर्विचार करे। AITUC स्पष्ट करती है कि इस टिप्पणी के खिलाफ आक्रोश पूरे देश में फैलेगा और 12 फरवरी की देशव्यापी आम हड़ताल में पूरी ताकत से व्यक्त होगा।
AITUC ट्रेड यूनियनों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी दृढ़ता से प्रतिबद्ध है। हैं। ट्रेड यूनियनों ने श्रमिक अधिकारों की स्थापना, सार्वजनिक क्षेत्र के निर्माण, औद्योगिक विस्तार और लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद (federalism) व नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा में केंद्रीय भूमिका निभाई है। ट्रेड यूनियनवाद को प्रगति में बाधा बताना इस विरासत को मिटाने जैसा है। न्यायपालिका जैसे उच्च संवैधानिक पद से ऐसी संकीर्ण और इतिहासविहीन दृष्टि अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
उठाई गई अंगुली
ट्रेड यूनियनों को निशाना बनाने के बजाय सुप्रीम कोर्ट को उन श्रम संहिताओं और नीतियों पर टिप्पणी करनी चाहिए थी जो सुनियोजित ढंग से मजदूरों के अधिकारों को कमजोर कर रही हैं और संपत्ति को कुछ गिने-चुने हाथों में केंद्रित कर रही हैं।
भारतीय संविधान न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक मानता है, जिस पर समाज के सबसे कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा की विशेष जिम्मेदारी है। ट्रेड यूनियन अधिकारों की अनुचित आलोचना या असंगठित मजदूरों के बहिष्कार को सामान्य ठहराने वाली टिप्पणियाँ संवैधानिक लोकतंत्र को कमजोर करती हैं।
AITUC की मांग है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट औद्योगिक ठहराव (Industrial Stability) के लिए ट्रेड यूनियनवाद को जिम्मेदार ठहराने वाली टिप्पणियाँ वापस ले और घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी की वैध मांग पर अपने रुख पर पुनर्विचार करे। AITUC स्पष्ट करती है कि इस टिप्पणी के खिलाफ आक्रोश पूरे देश में फैलेगा और 12 फरवरी की देशव्यापी आम हड़ताल में पूरी ताकत से व्यक्त होगा।
AITUC महासचिव अमरजीत कौर ने विज्ञप्ति के माध्यम से बताया है कि AITUC यूनियनों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी दृढ़ता से प्रतिबद्ध है।
