?️ विश्वकर्मा पूजा की शुभ कामना ?️
 
जो सर्वथा भगवान्‌ के शरण हो जाता है, उसका सब कुछ बदल जाता है। वह संसारी आदमी नहीं रहता। वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र नहीं रहता। वह संसार से ऊँचा उठ जाता है। उसकी वाणी विलक्षण हो जाती है। उसका जीवन विलक्षण हो जाता है। जब तक मन में इच्छा है कि ऐसा होना चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहिये तब तक असली शरणागति नहीं है।

       न लेने की इच्छा हो न देने की, न मरने की इच्छा हो न जीने की, न मुक्‍ति की इच्छा हो न बन्धन की, न ज्ञान की इच्छा हो न प्रेम की, किसी तरह की कोई इच्छा न हो। भगवान् सदा साथ रहते हैं। सब संसार भगवान्‌ का स्वरूप है। अतः भगवान्‌ का सहारा लेने पर संसार का सहारा भी मिलेगा।

     जैसे बालक का सब काम माँ करती है, ऐसे ही शरणागत का सब काम भगवान् करते है। शरणागत भक्त बालक की तरह हरदम मौज में रहता है। भगवान्‌ के शरण होकर आप निश्‍चिन्त, निर्भय, निःशोक तथा निशंक हो जाएं । फिर भगवान्‌ का स्मरण, भजन, नामजप, कीर्तन स्वाभाविक होगा, करना नहीं पड़ेगा। अगर करना पड़ता है तो भगवान्‌ के शरण में अभी नहीं हुये हैं।

 
सुरपति दास
इस्कॉन

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