Newspost, Spiritual Desk. Swami Dayanand Sharma
विचार चाहे कितने भी
उत्तम क्यों न हों.. वह
सार्थक तभी माने जाते हैं
जब उनकी झलक हमारे
व्यवहार में दिखती है।
अपने लाभ के लिए बोले गए एक असत्य-वचन से कई दिनों की पूजा-उपासना, यज्ञ-अनुष्ठान उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे बड़े परिश्रम से घड़े में एकत्र किए गए जल में कोई एक छेद कर दे, तो पूरा जल बह जाता है। ऐसा सारे धर्म-ग्रंथों में उल्लिखित है। कोई धर्म असत्य के मार्ग पर चलने की अनुमति नहीं देता है। यह बात बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होय वाले मुहावरे से स्पष्ट हो जाती है कि जैसा कर्म वैसा फल।
"ज्ञान" और "आचरण" का समन्वय बहुत आवश्यक है, क्योंकि बिना आचरण के ज्ञान व्यर्थ है। इसके विपरीत प्राप्त ज्ञान को यदि आचरण में नहीं उतारा और आगे बढ़ गये तो पीछे की उपलब्धियां क्षीण होती जाएंगी और क्षीण होते-होते शून्य भी हो जाएंगी और वही बात होगी कि "एक साधे सब सधै, सब साधे सब जाये।"
🙏🌸सर्वे भवन्तु सुखिनः🌸🙏
