Newspost, Spiritual Desk, Swami Dayanand Sharma.

महाजनस्य संसर्गः, कस्य नोन्नतिकारकः।
पद्मपत्रस्थितं तोयम्, धत्ते मुक्ताफलश्रियम् ॥

भावार्थ: – महापुरुषों का सामीप्य किसके लिए लाभदायक नहीं होता, कमल के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की बूँद मोती जैसी शोभा प्राप्त कर लेती है।

शास्त्रोक्त आचरण व्यवहार तपस्या कहलाता है।

   सदाचरण की साधना दैहिक तप है। वैचारिक रूप से पवित्र रहना मानसिक तप है। एक तप वाणी का भी है। जो कहा वह सोच-समझकर। जो तपस्वी होता है उसका जीवन संतुलित होता है।

     जिस तरह तपाकर,पीटकर, काटकर और घिस कर स्वर्ण की परख होती है उसी तरह त्याग,शीलता,सद्गुण एवं सद्कर्म से ही महापुरुषों की पहचान होती है। जो परहित के लिए स्वयं के सुख एवं संपत्ति को त्यागना जानते हैं,जिनका व्यवहार सदैव सौम्यता से भरपूर है,सद्गुण ही जिनके जीवन की प्राप्ति एवं सद्कर्म ही जिनके जीवन का ध्येय है वही तो महापुरुष हैं।

       बिना अग्नि में तपे सोना निखर नहीं सकता उसी तरह बिना परिश्रम में तपे हमारा जीवन भी नहीं निखर सकता है। जीवन में श्रेष्ठ पथ की ओर बढ़ेंगे तो आलोचनाओं का सामना भी अवश्य करना होगा।

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