आज का संदेश !!!

Newspost, Spiritual Desk. Presenter- Swami Dayanand Sharma.

      जीवन में आनन्द 'साधन' से नहीं अपितु 'साधना' से प्राप्त होता है। केवल मानव जन्म मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है, हमें जीवन जीने की कला सीखनी भी आवश्यक है। पशु-पक्षी तो बिल्कुल भी संग्रह नहीं करते फिर भी भी उन्हें इस प्रकृति द्वारा जीवनोपयोगी सब कुछ समय पर और नि:शुल्क प्राप्त हो जाता है।

    मन को कितना भी मिल जाए, यह बार-बार अपूर्णता का अनुभव कराता रहेगा। जो अपने भीतर तृप्त हो गया उसे बाहर के अभाव कभी परेशान नहीं करते। जीवन तो बड़ा आनंदमय है लेकिन हम अपनी इच्छाओं के कारण, अपनी वासनाओं के कारण इसे कष्टप्रद और क्लेशमय बनाते रहते हैं।

      केवल संग्रह के लिए जीने की प्रवृत्ति ही जीवन को कष्टमय बनाती है। जिसे इच्छाओं को छोड़कर आवश्यकताओं में जीना आ गया, समझो उसे सुखमय जीवन का सूत्र भी समझ आ गया।अत्यधिक धन संग्रह की इच्छा रजोगुण में वृद्धि का मूल कारण है। जब ज्यादा धन संग्रह हो जाता है तब फिर विलासिता, मोह व भय उत्पन्न होने लगते हैं और इसके द्वारा तमो गुण की प्रधानता होने लगती है।

🔸संत सुरपति दास, ISKCON

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