Newspost, Spiritual Desk. Swami Dayanand Sharma
श्रीकृष्ण जन्म की कहानी में "देवकी" शरीर की प्रतीक हैं और "वासुदेव" जीवनशक्ति अर्थात प्राण के। जब शरीर प्राण धारण करता है, तो आनंद अर्थात श्रीकृष्ण का जन्म होता है। लेकिन "अहंकार" (कंस) "आनंद" को खत्म करने का प्रयास करता है।
यहाँ देवकी का भाई कंस यह दर्शाता है कि शरीर के साथ-साथ अहंकार का भी अस्तित्व होता है। एक प्रसन्न एवं आनंदचित्त व्यक्ति कभी किसी के लिए समस्याएँ नहीं खड़ी करता है, परन्तु भावनात्मक रूप से दुखी व्यक्ति अक्सर दूसरों को दुखी करते हैं या उनकी राह में अवरोध पैदा करते हैं।
अहंकार का सबसे बड़ा शत्रु आनंद है। जहाँ आनंद और प्रेम है वहाँ अहंकार टिक नहीं सकता, उसे झुकना ही पड़ता है। जब अहंकार बढ़ जाता है तब शरीर एक जेल की तरह हो जाता है।
कंस के द्वारा देवकी और वासुदेव को कारावास में डालना इस बात का सूचक है कि जब अहंकार बढ जाता है तब शरीर एक जेल की तरह हो जाता है। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, जेल के पहरेदार सो गये थे। यहाँ पहरेदार वह इन्द्रियाँ हैं जो अहंकार की रक्षा कर रही हैं क्योंकि जब वह जागता है तो बहिर्मुखी हो जाता है।
विचार: रविशंकर जी
