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मान्यतानुसार रावण में अनेक गुण थे। सारस्वत ब्राह्मण महर्षि पुलस्त्य ऋषि का पौत्र और विसश्रवा का पुत्र रावण परम शिव भक्त, उद्भट राजनीतिज्ञ, महाप्रतापी, महापराक्रमी योद्धा,अत्यन्त बलशाली, शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता, प्रकाण्ड विद्वान, पण्डित एवं महाज्ञानी था।

       भगवान श्रीराम के कहने पर लक्ष्मण मरणासन्न रावण के पैरों के पास खड़े हुए। तब ज्ञानी रावण ने उन्हें जीवन के कुछ सूत्र दिए। यह सूत्र उस व्यक्ति के मुख से निकले जिसने अपने "पुरुषार्थ" से सब कुछ पा लिया और फिर "अहंकार" ने विवेक नष्ट कर दिया जिससे उसने अपना सब कुछ खो दिया।

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रावण ने लक्ष्मण को दिया उपदेश…

  1. मन का स्वभाव है सत्कर्मों को स्थगित करते रहना और दुष्कर्मों की ओर आकर्षित होना। उन्होंने कहा कि कई बार विचार आया कि मैं सीता माता को सम्मान सहित लौटा दूं। लेकिन मेरा मन इस सत्कर्म को टालता रहा। अर्थात शुभ करने का विचार आए तो उसे कभी स्थगित मत करना उसी क्षण उसी क्षण विचार को कार्य में बदल देना।
  2. शत्रु को कभी कमजोर मत समझना। मैंने श्री राम को वनवासी समझा। इसके पास ना घर है ना घाट, ना हाथी-घोड़े, ना राज-पाठ। वह मुझसे कैसे सामना करेगा, संभव ही नहीं था लेकिन असंभव भी संभव हो गया मैंने शत्रु को कमजोर समझने की भूल कर दी।
  3. राज को राज रहने दो। मैं तुमसे अपने मन का गहरा भेद बांट रहा हूं। लेकिन यह भेद किसी और से ना कहना। कितनी बार हमने यह बात किसी को राज की बात बताते हुए कही होगी। इससे अधिक हास्य पद बात कोई हो सकती है क्या?
  4. अगर तुम खुद अपना "राज", "राज नहीं रख पाए" तो कोई और क्या रखेगा? यही तो भूल हुई मुझसे। मैं अजेय था। लेकिन यह भेद.. कि मेरी नाभि में अमृत है, मैं छिपा नहीं पाया और इसी बात पर मेरा भाई ही मेरे सर्वनाश का कारण बन गया। यह मेरा अंतिम सूत्र है इसे कभी मत भूलना।

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