पथ प्रदर्शक कवि तुलसीदास जी ने रामचरित्र मानस के बाल काण्ड में निम्न पंक्तियों का उल्लेख किया है..

‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं ,रवि पावक सुरसरि की नाई’

Newspost, Inspirational/Spiritual Desk. Presenter- Swami Dayanand Sharma, Editing- RohitGupta.

उक्त पंक्तियों में ‘समरथ को नहीं दोष गुसाईं’ का वास्तविक अर्थ न जानते हुए अथवा जान बूझकर समाज के सबल व निर्बल अपने-अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए इन पंक्तियों का उपयोग करते चले आ रहे हैं।

गोस्वामी जी ने इन पंक्तियों में ही सब कुछ स्पष्ट कर दिया है। लेकिन सामान्यतः लोग आधी पंक्तियों का उल्लेख कर शोषण (अपराध) करने के लिए तर्क देते हैं। इसी दोहे में गोस्वामी जी ने यह बताया है कि ‘समर्थ’ कौन हो सकता है। इन शब्दों पर ध्यान देना आवश्यक है; रवि= सूर्य, पावक=अग्नि, सुरसरि अर्थात नदी जो बिना भेदभाव के सम भाव से सभी में अपनी शक्ति को बांट देते हैं; अर्थात सच्चे अर्थ में जो अभिभावक हैं- वे ही समर्थ हैं और उन्हें ही दोष नहीं है।

      साधारणतः समाज में इसका यह अर्थ लगाया जाता है कि समर्थवान के दोष को नहीं देखना चाहिए अथवा समर्थवान त्रुटि करने पर भी निर्दोष है अथवा समर्थवान दोष रहित होता है. दोषी सदैव कमजोर ही होता है। यह गलत है।

वास्तविक अर्थ पर एक दृष्टि का प्रयास….’समरथ को नहीं दोष गुसाईं’…समरथ(सम् +अर्थ) में पशुबल अथवा बाहुबल का भाव नहीं । उसमें भाव आत्मबल का है, जो कर्मो व विचारों से दोष रहित हो,जिसके कर्म भेद- भाव वाली बुद्धि से प्रेरित नहीं होते।

     इसीलिए उन्होंनेे आगे कहा कि 'रवि पावक सुरसरि की नाई' इनके कार्य भी भेदभाव रहित हैं.जो दोष रहित वही समर्थवान है. ईश्वर के अलावा दोषरहित दूसरा नहीं. इसीलिए समर्थवान और सर्वशक्तिमान सिर्फ एक वही है जो दोष रहित है। गीता में भी कहा गया है 'निर्दोषं हि समं ब्रह्म'. अतः इस भौतिक जगत में यदि कोई वास्तव में दोष रहित है तो उसे भी समर्थवान समझा जा सकता है।

वास्तव में गोस्वामी जी के दोहा में ईश्वर द्वारा पंचभूतों से रचित हमारे अस्तित्व की ही व्याख्या है, ऐसा हम कह सकते हैं। उस अस्तित्व को ठीक मार्ग पर चलाने के लिये धरा, नभ (सूर्य), अग्नि, वायु, जल यदि दंडित करते हैं तो वही दोषरहित हैं।

🔸शुभ रविवार! मंगल शुभकामनाएं!!🔸

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *