Newspost, National Desk. Raichur, Karnataka.
भगवान के नाम से भिक्षा मांगकर बटोरा धन, जरूरत पड़ी तो भगवान के घर के लिए दे दिया सब कुछ
साठ साल की एक भिखारी अम्मा ने अच्छे अच्छे दानवीरों को भी चौंका दिया है। इसका कारण यह नहीं है कि उन्होंने मंदिर के रेनोवेशन के लिये बहुत बड़ी रकम का दान किया है। बल्कि उन्होंने अब तक की अपनी पूरी कमाई ही भगवान को भेंट कर दी है। अब यह खबर वायरल हो रही है।
महादान की कहानी-
इस कहानी का संबंध कर्नाटक के रायचुर स्थित एक देवालय (Temple) से है। विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस प्राचीन मंदिर के सामने र आसपास के इलाके में भगवान के नाम से भिक्षा मांगने वाली 60 वर्ष की भिखारिन रंगम्मा ने बहुत बड़ा काम किया है। उन्होंने अपनी वर्षों की पूरी कमाई का दान मंदिर के रेनोवेशन के लिए कर दिया है। रंगम्मा के इस महादान से मंदिर समिति के लोगों को ही नहीं बड़े बड़े दानकर्ताओं को भी चौंका दिया है। अब इसकी चर्चा कर्नाटक में नहीं, बल्कि पूरे देश में हो रही है।
रंगम्मा की दान राशि की गिनती में 20 लोगों को लगे 6 घंटे
रायचुर, कर्नाटक के एक मंदिर के रेनोवेशन के लिए 60 वर्षीय महिला भिखारी रंगम्मा द्वारा दान की गई राशि की गिनती के लिए मंदिर समिति के 20 लोगों को 6 घंटे का समय लगा। उसका कारण यह था कि रंगम्मा ने भिक्षा में मिले सिक्कों और नोटों को जैसे तैसे रखा था। उन्हें क्रम से व्यवस्थित करने में 20 लोगों को 6 घंटे तक मेहनत करनी पड़ी तब कहीं जाकर पूरी दान राशि को गिना जा सका। रंगम्मा ने पैसों को तीन बोरियों में भरकर रखा था।
भिखारिन ने दान किये 1.83 लाख रुपये
रायचुर (कर्नाटक) में 60 वर्षीय रंगम्मा नामक महिला भिखारी ने एक पुराने मंदिर के रेनोवेशन के लिए ₹ 1.83 लाख दान किए हैं। कई वर्षों से वह मंदिर के आसपास भीख मांगकर गुज़ारा कर रही है। उक्त महिला दानी ने पैसे तीन बोरियों में रखे थे जिसे गिनने में 20 से ज़्यादा लोगों को लगभग 6 घंटे लगे। रंगम्मा ने कहा कि इससे उन्हें बहुत खुशी मिल रही है। उन्हें भगवान ने ही दिया था, अब उनका पैसा उन्हीं के मंदिर के नव निर्माण में काम आ रहा है।
याद आ गई एक कहानी…
माता चेन्नमाँ के सर्वस्व दान देने की घटना ने भगवान बुद्ध से जुड़ी एक उल्लेखनीय घटना की याद दिला दी है।
कहानी कुछ ऐसी है…
हुआ कुछ ऐसा कि तथागत भगवान बुद्ध एक नगर के बाहर विश्राम करने के लिए एक पेड़ की छांव में बैठे और ध्यान लगा लिये। यह खबर नगर में फैल गई। लोग उनके दर्शन और दान देकर उन्हें खुश करने के लिये वहाँ उमड़ पड़े। सामान्य जनता के साथ ही वहाँ के राजा भी सोने की थाली में छप्पन भोग और ढेर सारा सोना हीरा जवाहरात से भरे थाल को लेकर वहाँ पहुंचे। छप्पन भोग से सजी सोने की थाली उन्होंने भगवान बुद्ध के सामने रखा। भोजन का मनमोहक सुगंध वातावरण में फैल रहा था। राजा भी आश्वस्त थे कि तथागत का ध्यान अवश्य ही भंग होगा और यह सब देखकर वे प्रसन्न होंगे। तब उनका आशीर्वाद भी उन्हें जरूर मिलेगा। लेकिन, वैसा कुछ भी नहीं हुआ। भगवान बुद्ध अपने ध्यान में लीन रहे।
कहानी का क्लाइमैक्स
राजा हैरान परेशान वहीं बैठ गये और भगवान बुद्ध को एकटक निहारते रहे। कुछ पल बाद वहाँ एक वृद्ध भिखारी महिला पहुंची। उसने ध्यानमग्न भगवान बुद्ध को दूर से प्रणाम किया। फिर बड़ी अधीरता से अपनी झोली को टटोलने लगी। उसका हाथ बार बार झोली में कुछ खोजने का प्रयास कर रहा था। लेकिन बेचारी की झोली में आधी बची एक रोटी के सिवा कुछ भी नहीं था। कुछ सोचती हुई मातृभाव से उसने रोटी का वह टुकड़ा निकाला और सजल नेत्रों से वहीं राजा की थाली के बगल में एक पत्ते पर रख दिया।
फिर क्या हुआ ?
बूढ़ी भिखारिन ने जैसे ही रोटी का टुकड़ा वहाँ रखा, वैसे ही महात्मा ने आँखें खोल दी। उन्होंने रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा और बड़े चाव से उसे खाने लगे। यह दृश्य देखकर राजा सहित वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए। छप्पन भोग की थाली और स्वर्ण आभूषणों से भरी थालियों को देखा तक नहीं। यह सब देखकर राजा का धैर्य टूट गया। उन्होंने कुछ कड़े शब्दों में पूछा कि आखिर इस भिखारिन की सूखी आधी रोटी ही आप क्यों ग्रहण कर रहे हैं।
इस प्रश्न के उत्तर में भगवान बुद्ध ने तब कहा था कि यह बूढ़ी माँ सबसे बड़ी दानदाता है। उसने अपना सबकुछ दान कर दिया है। इसके साथ उन्होंने एक हाथ में राजा की रोटी और दूसरे में भिखारिन के रोटी के टुकड़े को उठाया। सभी यह दृश्य देखकर भौंचक रह गये। वृद्धा की रोटी से दूध और राजा की रोटी से रक्त टपकता देखा। तथागत ने भोजन की पवित्रता को भी समझा दिया था।
