?️शुभ प्रभात ?️
Shared: Swami Dayanand Sharma, NPG Media
मनुष्य अपनी आवश्यकताओं से दुखी नहीं है अपितु अपनी बेलगाम इच्छाओं से दुःखी रहता है। दुःख का मूल कारण हमारी आवश्कताएं नहीं हमारी इच्छाएं हैं। हमारी आवश्यकताएं तो कभी पूर्ण भी हो सकती हैं मगर इच्छाएं नहीं। इच्छाएं आज तक किसी की भी पूरी नहीं हो पाई हैं। एक इच्छा पूरी होती है कि मन में दूसरी इच्छा का जन्म हो जाता है।
सुखी जीवन जीने का केवल एक ही रास्ता है और वह है, अभाव की तरफ दृष्टि ना डालना। आज हमारी स्थिति यह है कि जो हमें प्राप्त है उसका आनंद तो हम लेते नहीं,वरन जो प्राप्त नहीं है उसका चिन्तन करके जीवन को शोकमय कर लेते हैं।
दुःख का मूल हमारी आशा ही है। हमें संसार में कोई दुःखी नहीं कर सकता, हमारी अपेक्षाएं ही हमें रुलाती हैं। अति इच्छा रखने वाले और असंतोषी हमेशा दुःखी ही रहते हैं। जिसकी इच्छाएं सीमित हैं, उसके दुःख भी स्वतः ही सीमित अथवा कम हो जाते हैं।
साभार: सुरपति दास
इस्कॉन
