नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागरम् पारपारगहराम्॥?
नवरात्रि के पांचवें दिन हम विशुद्ध चक्र को जागृत करते हैं। पांचवें दिन स्कन्द माता की आराधान इस मंत्र से जरूर करनी चाहिए।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमातायै नम:!
जब कुण्डलिनी-शक्ति विशुद्ध-चक्र में प्रवेश कर विश्राम करने लगती है,तब उस सिद्ध-साधक के अन्दर संसार त्याग का भाव प्रबल होने लगता है और उसके स्थान पर सन्यास भाव अच्छा लगने लगता है। संसार मिथ्या,भ्रम-जाल,स्वप्नवत् आदि के रूप में लगने लगता है और हर तरह की मोह माया से वो मुक्त होने लगता है उस सिद्ध व्यक्ति में शंकर जी की शक्ति आ जाती है।
विशुद्ध चक्र बहुत ही महत्वपूर्ण चक्र होता है। यह जागृत होते ही व्यक्ति को वाणी की सिद्धि प्राप्त होती है। चेहरे पर तेज और शांति आ जाती है और उसके अंदर परमात्मा के जैसा तेज और चमक आ जाती है।
इस चक्र के जागृत होने से आयु में वृद्धि होती है। संगीत विद्या की सिद्धि प्राप्त होती है। शब्द का ज्ञान होता है। व्यक्ति विद्वान होता है। वो जो बोलता है, वो सच होने लगता है। हर काम में उसको सफलता मिलने लग जाती है।
