Category: Literature

दो मुक्तक.

बरसा पानी, बही झोपड़ी खेत खेत अब पानी है!!नाले भी तालाब बन गए, कांधे कांधे पानी है!! पहले आंख तरेरा सूरज,आज बादलों की बारी है,मुझ निर्धन के स्वप्न बह गए,…

“धूप ‌अब खिलती नहीं”

? सामयिक साहित्य थक गए है पांव चलते,छांव अब मिलती नहीं है!!मुरझा रहे है पेड़ देखोधूप अब खिलती नहीं है!!हाथ में आरी सभी केखुरपियां दिखती नहीं हैं!!बाग से खुशबू नदारद,पंखुड़ी…