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चलो रे मन वृंदा वन की ओर…..
मेरे मन कछु और है,
दाता के कछु और,
हम सोचत कछु और हैं,
होवत है कछु और।
सुख की मृगतृष्णा ले डूबी,
स्वांस भई कमजोर,
हरि बिन जीवन की बगिया में,
साँझ भई ना भोर।
चलो रे मन वृंदावन की ओर…….
माया प्रेरा दर दर भटका,
जिसका ओर न छोर।
अबहूँ चेत ले रे मन मूरख,
हरि बिनु नाहिन ठौर।
चलो री मन वृंदावन की ओर…
✍? दयानन्द
