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“धूप ‌अब खिलती नहीं”

? सामयिक साहित्य थक गए है पांव चलते,छांव अब मिलती नहीं है!!मुरझा रहे है पेड़ देखोधूप अब खिलती नहीं है!!हाथ में आरी सभी केखुरपियां दिखती नहीं हैं!!बाग से खुशबू नदारद,पंखुड़ी…