Newspost, Spiritual Desk. Swami Dayanand Sharma.
मनुष्य का जीवन उसी समय सार्थक होता है जब उसका चित्त बाहरी दुनिया की अस्थिर लहरों से हटकर सत्य, चेतना और ईश्वर-भाव में स्थिर हो जाता है। प्रार्थना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं होती; वह मन की वह पवित्र अवस्था है जहाँ सारी वृत्तियाँ एक दिशा में बहने लगती हैं। जब तक मन संसार के आकर्षणों में उलझा रहता है, साधक भीतर ही भीतर अस्थिर और विचलित बना रहता है।
ईश्वर-गुणों का चिंतन मन के लिए निर्मल दर्पण का कार्य करता है। इसी चिंतन में मन अपनी चंचलता को पहचानकर संयम की ओर अग्रसर होता है। सुख-दुख, राग-द्वेष और प्रिय-अप्रिय जैसी अवस्थाएँ क्षणिक तरंगों की भाँति उठती हैं और मन को बाहरी संसार की ओर खींच ले जाती हैं। विषय-वासनाओं में फँसकर उत्पन्न राग-द्वेष आत्मा की गति को रोक देते हैं और मन की शांति को भंग कर देते हैं।
हनुमान जी निःस्वार्थ भक्ति, पूर्ण समर्पण और दिव्य सेवा के शाश्वत आदर्श हैं। उनका व्यक्तित्व आज भी अटल निष्ठा, निर्भयता और प्रभु-चरणों के प्रति अखंड प्रेम का प्रकाश फैलाता है। उनमें न अहंकार है, न किसी फल की कामना। वे अज्ञान के अंधकार को भस्म करने वाली ज्ञान-अग्नि भी हैं और भक्त-हृदय को शीतलता देने वाला करुणा-सरोवर भी। इसी कारण वे भक्तों के रक्षक और भगवान के परमप्रिय कहलाते हैं।
🚩कलियुग में हमारे पालक,रक्षक और महाराज महावीर हनुमान जी की कृपा हम सभी पर बनी रहे, मंगल शुभकामनाएं!🚩🪷🙏🏻
